षारदीय नवरात्री तिथी

Created on: Nov, 23 2014 03:51 pm in fastival2015

इस वर्ष 2015 में षारदीय नवरात्री 13 ओक्टोंबेर, अष्विन षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होंगे। इस दिन हस्त नक्षत्र, प्रतिपदा तिथि के दिन षारदिय नवरात्रों का पहला नवरात्रा होगा। इन दिनों में जप पाठ, व्रत, यज्ञ, दान आदि षुभ कार्य करने से व्यक्ति को पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।

सर्वप्रथम श्री गणेष पूजा

प्रतिपदा तिथि के दिन नवरात्रे पूजा षुरु करने से पहले कलष स्थापना कि जाती है जिसे घट स्थापना के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म में देवी पूजन का विषेष महत्व है। इसमें नौ दिन व्रत पूजन करने के उपरान्त नवें दिन दस वर्ष के कम आयु की कन्याओं को भोजन कराया जाता है।

घट स्थापना का षुभ मुहूर्त

सभी धार्मिक तीर्थ स्थलों में इस दिन प्रातः सूर्योदय के बाद षुभ मुहूर्त समय में घट स्थापना की जाती है। नवरात्रे के पहले दिन माता दुर्गा एवं श्री गणेष देव की पूजा की जाती है। इस दिन मिट्टी के बर्तन में मिट्टी डालकर जौ आदि के बीज ड़ालकर बोने के लिए रखे जाते हैं।

भक्तजन इस दिन व्रत उपवास तथा यज्ञ आदि का संकल्प लेकर देवी माता की पूजा प्रारम्भ करते हैं। नवरात्रे के प्रथम दिन माता के षैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है। माता षैलपुत्री हिमालय राज की पुत्री है जिन्हें देवी पार्वती के नाम से भी जाना जाता है। रात्रि में माता दुर्गा के नाम का पाठ किया जाता है। इन नौ दिनों में रात्रि में जागरण करने से भी विषेष लाभ प्राप्त होते हैं।

माता के नौ रुप

नवरात्रो में माता के नौ रुपों कि पूजा की जाती है। नौ देवीयों के नाम इस प्रकार है।

प्रथम-शैलपुत्री, दूसरी-ब्रह्मचारिणी, तीसरी-चन्द्रघंटा, चैथी-कुष्मांडा, पांचवी-स्कंधमाता, छठी-कात्यायिनी, सातवीं-कालरात्री, आठवीं-महागौरी, नवीं-सिद्धिदात्री

षारदीय नवरात्रा घट स्थापना विधि

षारदीय नवरात्री का आरम्भ अष्विन षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से कलष स्थापना के साथ होता है। कलष को हिन्दु विधानों में मंगलमूर्ति गणेष का स्वरुप माना जाता है। अतः सबसे पहले कलष की स्थापना की जाती है। कलष स्थापन के लिए भूमि को धोकर एवं गाय के गोबर तथा गंगा जल से लीपकर षुद्ध किया जाता है। विधान के अनुसार इस स्थान पर सात प्रकार की मिट्टी को मिलाकर एक पीठ तैयार किया जाता है। परन्तु अक्सर ऐसा मुमकिन नहीं होता ऐसे में भक्तजन गंगा नदी के किनारे से लाई गई मिट्टी भी प्रयोग में ले सकते हैं।

प्रथम दिन माता षैलपुत्री का पूजन

कलष में सात प्रकार की मिट्टी, सुपारी, मुद्रा सादर भेंट किया जाता है एवं पंच प्रकार के पल्लव से कलष को सुषोभित किया जाता है। इस कलष के नीचे सात प्रकार के अनाज एवं जौ बोये जाते हैं जिन्हें दषमी तिथि को काटा जाता है। ‘‘जयन्ती मंगला काली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा, स्वधा नामोस्तुते’’ इसी मंत्र जाप से साधक के परिवार को सुख, सम्पत्ति एवं आरोग्य का आर्शीवाद प्राप्त होता है।

देवी की प्रतिमा स्थापित करना

कलष स्थापना के बाद देवी प्रतिमा स्थापित करते हंै। देवी दुर्गा की प्रतिमा पूजा स्थल पर बीच में स्थापित की जाती है तथा उनके दोनों तरफ यानी दायीं ओर देवी महालक्ष्मी, भगवान गणेष तथा विजया नामक योगिनी की प्रतिमा रहती है। बायीं ओर कार्तिकेय, देवी सरस्वती तथा जया नामक योगिनी रहती है।

भगवान षंकर की पूजा के बिना कोई भी पूजा पूरी नहीं मानी जाती। अतः भगवान भोलेनाथ की भी पूजा की जाती है। प्रथम दिन भगवती दुर्गा षैलपुत्री की पूजा फूल, अक्षत, रोली, चंदन से होती है। अंत में दुर्गा माता की आरती से पूजा का समापन होता है।

नवरात्रों में किस दिन किस ग्रह की षांति पूजा करें

नवरात्र में नवग्रह शांति की विधि -

प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति करानी चाहिए

द्वितीय के दिन राहु ग्रह की शान्ति करने सम्बन्धी कार्य करने चाहिए

तृतीया के दिन बृहस्पति ग्रह की शान्ति कार्य करना चाहिए

चतुर्थी के दिन व्यक्ति शनि शान्ति के उपाय कर स्वयं को शनि के अशुभ प्रभाव से बचा सकता है

पंचमी के दिन बुध ग्रह

छठ के दिन केतु

सप्तमी के दिन शुक्र

अष्टमी के दिन सूर्य

एवं नवमी के दिन चन्द्रमा की शांति कार्य किए जाते हैं

प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शांति होती है इसलिए मंगल ग्रह की पूजा करनी चाहिए। पूजा के बाद पंचमुखी रूद्राक्ष, मूंगा अथवा लाल अकीक की माला से 108 मंगल बीज मंत्र का जप करना चाहिए। जप के बाद मंगल कवच एवं अष्टोत्तरशतनाम का पाठ करना चाहिए।

 

नवरात्रों में किस देवी देवता का पूजन करें

नवरात्र में मां दुर्गा के साथ-साथ भगवान श्रीराम हनुमान की अराधना भी फलदायी बताई गई है। सुंदरकाण्ड, रामचरितमानस और अखण्ड रामायण से साधक को लाभ होता है तथा शत्रु बाधा दूर होती है एवं मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। नवरात्र में विधि विधान से दुर्गा मां का पूजन करने से कार्य सिद्ध होते हैं और मन को शांति मिलती है।

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