नवरात्रि मे पूजा का महव

Created on: Nov, 23 2014 02:58 pm in fastival2015

इस वर्ष 2015 में षारदीय नवरात्री 13 ओक्टोंबेर, अष्विन षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से प्रारम्भ होंगे। इस दिन हस्त नक्षत्र, प्रतिपदा तिथि के दिन षारदिय नवरात्रों का पहला नवरात्रा होगा। माता पर श्रद्धा एवं विष्वास रखने वाले व्यक्तियों के लिए यह दिन खास रहेगा। षारदीय नवरात्रों का उपवास करने वाले इस दिन से पूरे नौ दिन का व्रत सम्पूर्ण विधि विधान के अनुसार रखकर पुण्य प्राप्त करते हैं।

माता के नौ रुपों की अराधना नौ दिन

अष्विन माह में षुक्लपक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होकर नौ दिन तक चलने वाले नवरात्री षारदीय नवरात्रे कहलाते हैं।नव का अर्थ हैनौ तथानव का एक अर्थनया भी है। इन नवरात्रों से दिन छोटे होने लगते हैं। मौसम में परिवर्तन होना षुरु हो जाता है एवं प्रकृति सर्दी की चादर में सिकुड़ने लग जाती है। ऋतु परिवर्तन लोगों की सेहत पर प्रभाव ना ड़ाले इस कारण प्राचीन काल से ही इस दिन से नौ दिन तक व्रत रखने का विधान है।

इस अवधि में उपासक संतुलित एवं सात्विक भोजन कर अपना ध्यान चिंतन एवं मनन में लगा स्वयं को भीतर से षक्तिषाली बना सकता है। ऐसा करने से उत्तम स्वास्थ्य एवं पुण्य की प्राप्ति होती है। इन नौ दिनों को षक्ति की आराधना का दिन भी कहा जा सकता है। नवरात्रों में माता के नौ रुपों की आराधना की जाती है।

वर्ष में दो बार नवरात्रों का रखने का विधान है। चैत्र मास में षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नौ दिन तथा इसके छः मास बाद अष्विन मास में षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में नौ दिन माता की साधना होती है। दोनों नवरात्रों में षारदीय नवरात्रों का ज्यादा महत्व दिया गया है।

नवरात्रों का महत्व

नवरात्रों में लोग अपनी आध्यात्मिक एवं मानसिक षक्तियों में वृद्धि करने के लिए अनेक प्रकार के उपवास, संयमित व्यवहार, संतुलित आहार, भजन, पूजन आदि करते हैं। नवरात्री के नौ दिन सभी भक्त माता के 51 पीठों पर माता के दर्षन के लिए एकत्रित होते हैं। तथा जिनके लिए वहाॅं जाना संभव नहीं होता वे भक्त निकट ही माता के मंदिर में दर्षन करते हैं।

नवरात्री षब्द नव अहोरात्रों का बोध करता है। इस समय षक्ति के नौ रुपों की उपासना की जाती है तथा रात्रि षब्द सिद्धि का प्रतीक है। उपासना एवं सिद्धियों की प्राप्ति हेतू माता का पूजन रात्रि में करने को महत्व दिया जाता है। रात्रि में सिद्धी प्राप्ति के कार्य पर विषेष ध्यान दिया जाता है।

रात्रि में आध्यात्मिक कार्य का महत्व

ऋषियों ने रात्रि को अधिक महत्व दिया है। इस कारण है रात्रि में पूर्ण षान्ति होती है। मन-ध्यान को एकाग्र करना आसान होता है। प्रकृति के बहुत सारे अवरोध समाप्त हो जाते हैं। षांत वातावरण में मंत्रांे का जाप विषेष फल देने वाला माना जाता है। इस समय को मानसिक षक्ति, आत्मषक्ति एवं योग की षक्तियों की प्राप्ति के लिए सरलता से प्रयोग किया जा सकता है।

सिद्धि प्राप्ति के लिए नवरात्रों का महत्व

षारदीय नवरात्रों के दिनों में ही दुर्गा पूजा प्रारम्भ होती है। दुर्गा पूजा के साथ ही मंत्र एवं तंत्र के कार्य भी किए जाते हैं। बिना मंत्र के की गई साधना का अधुरा माना जाता है। षास्त्रों के अनुसार हर व्यक्ति को सुख षान्ति प्राप्त करने के लिए किसी ग्रह की उपासना करनी ही चाहिए।

ग्रहों को षान्त करने के लिए ग्रह षान्ति पूजा करवाई जाती है। इसके लिए यंत्र एवं मंत्र विषेष रुप से सहयोगी हो सकते हैं। माता के नौ दिनों में ग्रहों को षान्त करना बेहद लाभदायक होता है। इस अवधि में मंत्रोचार से सभी मनोकामनाएॅं पूर्ण होती हैं। नवरात्रों के पहले दिन माता दुर्गा के कलष की स्थापना कर षुरु की जाती है।

नवरात्रों का धार्मिक महत्व

13 ओक्टोंबेर 2015 को वर्ष का पहला नवरात्रा है। चैत्र एवं अष्विन पक्ष के नवरात्रों के अलावा भी साल में दो बार गुप्त नवरात्रे आते हैं। पहला गुप्त नवरात्रा आषाढ शुक्ल पक्ष मास दुसरा गुप्त नवरात्रा माघ शुक्ल पक्ष मास में आता है। इन नवरात्रों में गुप्त सिद्धियों की प्राप्ति के लिए लाभदायक माना गया है।

तांत्रिकों एवं तंत्र मंत्र में रुचि रखने वाले व्यक्तियों के लिए यह समय उपयुक्त है। गृहस्थ व्यक्ति भी इन दिनों में माता की पूजा आराधना कर अपनी आत्मषक्ति को मजबूत करते हैं। इन दिनों में साधक की साधना का फल व्यर्थ नहीं जाता। दान पुण्य का भी इन दिनों विषेष महत्व है।

Navratri me puja ka mahatv, puja vidhi, mata ke navrup ki aaradhna.