नवरात्रि की प्रचलित कथाएं

Created on: Nov, 23 2014 03:57 pm in fastival2015

अष्विन षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि ने नवमी तिथि के मध्य के समय को नवरात्रा के नाम से जाना जाता है। इन नवरात्रों का महत्व सभी नवरात्रों से अधिक है। इन्हें षारदीय नवरात्रा भी कहा जाता है। इस वर्ष यह नवरात्रा 13 ओक्टोंबेर से षुरु होकर 23 अक्टूबर तक चलेंगे।

प्रतिपदा तिथि के दिन प्रातः स्नानादि करके संकल्प किया जाता है। इसके पष्चात कलश स्थापना कि जाती है तथा प्रतिदिन ज्योत जलाकर माता की पूजा की जाती है। नावरात्रा के विषय में कई कथाएॅं प्रचलित हैं। कथाओं के माध्यम से आइए समझते हैं नवरात्रों का महत्व।

नवरात्रा की प्रचलित कथाएं इस प्रकार है:-

एक पौराणिक कथा के अनुसार नवरात्रों में मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का वध करके देवताओं को उसके कष्टों से मुक्त किया था। एक बार की बात है, जब महिषासुर राक्षस के आंतक से सभी देवताओ भयभीत रहते थे। महिषासुर ने भगवान शिव की आराधना करके अद्वितीय शक्तियाॅं प्राप्त कर ली थी और तीनों देव अर्थात ब्रह्मा, विष्णु महेश भी उसे हराने में असमर्थ थे। उस समय सभी देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु महेश से अपनी दुविधा व्यक्त की। तब ब्रह्मा, विष्णु महेश ने अपनी शक्तियों को मिलाकर शक्ति दुर्गा को जन्म दिया। अनेक शक्तियों के तेज से जन्मी माता दुर्गा ने महिषासुर का वध कर सबके कष्टों से मुक्त किया।

नवरात्रि के विषय में एक अन्य कथा:-

इसके अनुसार एक नगर में एक ब्राह्माण रहता था। वह मां भगवती दुर्गा का परम भक्त था। उसकी एक कन्या थी जिसका नाम सुमति था। ब्राह्मण नियम पूर्वक प्रतिदिन माॅं दुर्गा की पूजा और होम किया करता था। सुमति भी प्रतिदिन इस पूजा में भाग लिया करती थी। एक दिन सुमति खेलने में व्यस्त होने के कारण भगवती पूजा में शामिल नहीं हो सकी। यह देख उसके पिता को क्रोध गया है और क्रोधवश उसके पिता ने कहा की वह उसका विवाह किसी दरिद्र और कोढ़ी से करेगा।

पिता की बातें सुनकर बेटी को बड़ा दुख हुआ, और उसने पिता के द्वारा क्रोध में कही गई बातों को सहर्ष स्वीकार कर लिया। कई बार प्रयास करने से भी भाग्य का लिखा नहीं बदलता है। अपनी बात के अनुसार उसके पिता ने अपनी कन्या का विवाह एक कोढी के साथ कर दिया है। सुमति अपने पति के साथ विवाह कर चली गई। उसके पति का घर होने के कारण उसे वन में घास के आसन पर रात बडे कष्ट में बितानी पडी।

गरीब कन्या की यह दशा देखकर माता भगवती उसके पूर्व पुण्य प्रभाव से प्रकट हुई और सुमति से कहने लगी की ‘‘है कन्या मैं तुम पर प्रसन्न हूं, मैं तुम्हें कुछ देना चाहती हूं मांगों क्या मांगती हो।’’ इस पर सुमति ने कहा कि आप मेरी किस बात पर प्रसन्न हों, कन्या की यह बात सुनकर देवी कहने लगी की मैं तुझ पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं, तू पूर्व जन्म में भील की स्त्री थी, और पतिव्रता थी।

एक दिन तेरे पति भिल द्वारा चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड कर जेलखाने में कैद कर दिया था। उन लोगों ने तेरे और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया था। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने तो कुछ खाया और ही जल पिया इसलिये नौ दिन तक नवरात्र का व्रत गया।

है ब्राह्माणी, उन दिनों में जो व्रत हुआ, उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर आज मैं तुम्हें मनोवांछित वरदान दे रही हूँ, कन्या बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न है तो कृ्पा करके मेरे पति के कोढ़ दूर कर दिजिए। माता के कन्या की यह इच्छा शीघ्र पूरी कर दी। उसके पति का शरीर माता भगवती की कृपा से रोगहीन हो गया।

रामायण में नवरात्रों का वर्णन

रामायण के एक प्रसंग के अनुसार भगवान श्री राम, लक्ष्मण, हनुमान समस्त वानर सेना द्वारा आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक नौ दिनों तक माता शक्ति की उपासना कर दशमी तिथि को लंका पर आक्रमण किया था। तभी से नवरात्रों में माता दुर्गा कि पूजा करने की प्रथा चली रही है

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