नवरात्रा प्रारम्भ 2015

Created on: Nov, 23 2014 04:02 pm in fastival2015

अष्विन षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक यह व्रत किया जाता है। प्रतिपदा तिथि के दिन प्रातः स्नानादि करके संकल्प किया जाता है। इस वर्ष 13 ओक्टोंबेर से षुरु होकर 23अक्टूबर तक नवरात्रा रहेंगे। व्रत संकल्प लेने के पष्चात स्वयं मिट्टी की वेदी बनाकर उसमें जौ बोते हैं। इस वेदी पर घट स्थापना होती है तथा घट के ऊपर कुल देची की प्रतिमा को स्थापित किया जाकर उसे पूजा जाता है। दुर्गा सप्तषती का पाठ किया जाता है तथा पाठ पूजन के दौरान अखण्ड दीप जलता रहता है। वैष्णव लोग श्रीराम की भी स्थापित करते हैं। कहीं कहीं पूरे नवरात्रा रामलीलाएॅं भी होती हैं।

नवरात्रा में देवी की स्तुति

माॅं दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए भक्तजन यह देवी स्तुति नित्य प्रति प्रातः एवं संध्याकाल में गाते हैं:-

मंगल की सेवा सुन मेरी देवा हाथ जोड़ कर तेरे द्वार खडे।

पान सुपारी ध्वजा नारियल ले ज्वाला तेरे भेंट धरें ।।

सुन जगदम्बे कर विलम्बे सन्तन की भण्डार भरे।

सन्तन प्रतिपाली सदा कुशाली जै काली कल्याणी करे।। मंगल की ….

बुद्धि विधाता तू जगमाता मेरा कारज सिद्धि करे।

चरण कमल का लिया आसरा शरण तुम्हारी आन परे।। मंगल की ….

अब जब पीर परे भक्तन पर तब तब आय सहाय करे।

सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ….

बार-बार तैं सब जग मोह्रो तरूणी रुप अनूप घरे।

माता होकर पुत्र खिलावे कहीं भार्या भोग करे।।मंगल की ….

सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।

सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ….

ब्रह्रा विष्णु महेश सहसफल लिये भेंट तेरे द्वार खडे।

अटल सिंहासन बैठी माता सिर सोने का छत्र फिरे।।

बार शनीचर कुंकुम वरणों जब लौ कंठ कर हुकुम करे।

खडग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये रक्त बीज को भस्म करें।।

शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे महिषासुर को पकड दले।

सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खडे जयकार करे।।मंगल की ….

आदितावार आदि को बीरा जन अपने को कष्ट हरे।।

कोप होयकर दानव मारे चण्ड मुण्ड सब चूर करे।

जब तुम देखो दया रुप हो पल में संकट दूर करे।

सौम्य स्वभाव धरयो मेरी माता जन की अरज कबूल करें।।

सिंह पीठ कर चढी भवानी अटल भवन में राज करें।

ब्रह्मा वेद पढे तेरे द्वारे शिव शंकर जी ध्यान धरे।।

इन्द्र कृष्ण तेरे करे आरती चंवर कुबेरे डुलाय रहे।

जय जननी जय मातु भवानी अटल भवन में राज्य करे।।

नवरात्रा-देवी के नौ रुपों का पूजन

हर वर्ष नवरात्रा दो बार आते हैं। पहले नवरात्रा चैत्र षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से षुरु होकर चैत्र माह के षुक्ल पक्ष की नवमी तिथि तक चलते हैं। अगले नवरात्रा षारदीय नवरात्रा कहलाते हैं। यह नवरात्रा अष्विन मास में षुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से षुरु होकर नवमी तिथि तक रहते हैं। दोनों में ही देवी का पूजन किया जाता है।

अष्विन मास के नवरात्रा के बाद दषहरा पर्व मनाया जाता है। नवरात्रों में माता के नौ रुपों की पूजा परंपरागत तरीके तथा पूरे विधि विधान सहित करी जाती है।

नवरात्रा पूजन प्रारम्भ विधि

नवरात्रा स्थापना प्रतिपदा तिथि के दिन कलश स्थापना कि जाती है। कलश स्थापना करने से पहले भूमि को गंगा जल छिडकर शुद्ध किया जाता है। भूमि शुद्ध करने के लिये गाय का गोबर भी प्रयोग किया जा सकता है।

कलश से संबन्धित एक मान्यता के अनुसार कलश को भगवान श्री गणेश का प्रतिरुप माना गया है, इसलिये सबसे पहले कलश का पूजन किया जाता है। पूजा में सभी नदियों, समुद्रों, नवग्रहों, दिशापालकों, दिशाओं, नगर देवता, ग्राम देवता सहित सभी को आमंत्रित किया जाता है।

पांच प्रकार के पत्तों से कलश को सजाया जाता है। इसके पष्चात देवी की प्रतिमा स्थापित कर पूजन प्रारम्भ किया जाता है।

Madurgastuti,shreeramkipuja.